हैदराबाद/रायपुर - हैदराबाद के त्रयनगर स्थित कारवान दादावाड़ी में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत दिनांक 7 अगस्त 2026 को परम पूज्य गुरुदेव सूरि सम्राट, राष्ट्ररत्न, अवंती तीर्थोद्धारक, गुणायाजी तीर्थ जीर्णोद्धार प्रेरक, खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में कहा कि परम शांति और परम समाधि का अनुभव तभी संभव है, जब हमारी सोच सकारात्मक, स्वभाव सरल, वाणी मधुर और हृदय पवित्र हो। मनुष्य अकेला नहीं जीता, बल्कि परिवार, समाज और संबंधों के बीच अपना जीवन व्यतीत करता है। इसलिए उसकी सोच, भाषा और व्यवहार का प्रभाव केवल उस पर ही नहीं, बल्कि उसके संपूर्ण परिवेश पर भी पड़ता है। एक व्यक्ति का सद्व्यवहार पूरे परिवार को स्वर्ग बना सकता है, जबकि उसी का दुर्व्यवहार उसी घर को नरक बना देता है।
गुरुदेव श्री ने कहा कि मनुष्य प्रायः दूसरों के व्यवहार का मूल्यांकन अधिक करता है और स्वयं का कम। यदि कोई हम पर क्रोध करे, तो केवल उसके क्रोध को देखने के बजाय उसके कारण को समझने का प्रयास करना चाहिए। जब हम कारण तक पहुँचते हैं, तब मन में प्रतिशोध नहीं, बल्कि करुणा का भाव जागृत होता है। उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि अच्छा दिखने का नहीं, बल्कि अच्छा बनने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि जो वास्तव में अच्छा होता है, वही स्वतः अच्छा दिखाई देता है।
गुरुदेव श्री ने आगे कहा कि प्रकृति ने प्रत्येक मनुष्य को जीवन रूपी तीन पन्नों की एक डायरी प्रदान की है। पहला पन्ना जन्म का है और तीसरा पन्ना मृत्यु का। ये दोनों हमारे पूर्वकर्मों के अनुसार पहले से लिखे जा चुके हैं। केवल बीच का दूसरा पन्ना कोरा है, जिसे लिखने का अधिकार हमें प्राप्त हुआ है। यही वर्तमान आगे चलकर हमारा भविष्य बनता है। इसलिए इस दूसरे पन्ने को क्रोध, कटुता, ईर्ष्या और कटु वचनों से नहीं, बल्कि प्रेम, नम्रता, मधुरता और सद्व्यवहार से भरना चाहिए। भगवान श्रीराम ने वनवास देने वाली माता कैकेयी के चरणों में भी उसी श्रद्धा से वंदन किया, जिस श्रद्धा से वे माता कौशल्या के चरणों में करते थे। यही उनका भगवानत्व था।
अपने मंगल प्रवचन के समापन में गुरुदेव श्री ने कहा कि हमारा व्यवहार सामने वाले के स्वभाव के अनुसार नहीं, बल्कि अपने संस्कारों के अनुसार होना चाहिए। भले व्यक्ति के साथ भलाई करना सामान्य बात है, किन्तु बुरे के साथ भी भलाई करना ही परमात्मा का मार्ग है। सदैव विनम्र और कोमल बने रहें। जिस प्रकार लोहा नरम होकर उपयोगी औजार बनता है और सोना नरम होकर आभूषण का रूप लेता है, उसी प्रकार मनुष्य भी विनम्रता और मधुर व्यवहार अपनाकर परमात्मा बनने की दिशा में अग्रसर होता है।
गुरुदेव श्री के प्रेरणादायी प्रवचन ने सभी को सद्व्यवहार, विनम्रता एवं सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ जीवन के प्रत्येक क्षण को सार्थक बनाने की प्रेरणा प्रदान की।