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सम्यक दर्शन से घटता है संसार का मोह, भूल स्वीकारना सीखें : साध्वी मंजुलाश्रीजी

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आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत श्री जिनकुशलसूरि जैन दादाबाड़ी में व्याख्यान।

रायपुर - आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत श्री जिनकुशलसूरि जैन दादाबाड़ी में अध्यात्मसार ग्रंथ का पाठ करते हुए शनिवार को पूज्य साध्वी मंजुलाश्रीजी महाराज साहिबा ने कहा कि सम्यक दर्शन की प्राप्ति होने पर संसार के प्रति मोह कम होने लगता है। हमें अपने लिए संसार को छोटा बनाना है और आत्मा के वास्तविक स्वरूप की ओर बढ़ना है। सम्यक दर्शन की प्राप्ति होने पर बाहरी दुनिया की चकाचौंध छोटी लगने लगती है और आत्मकल्याण का मार्ग बड़ा दिखाई देता है।

साध्वीश्री ने कहा कि जीवन में बड़ा बनने का अर्थ केवल पद, प्रतिष्ठा या धन प्राप्त करना नहीं है, बल्कि अपनी भूल को स्वीकार करने का साहस विकसित करना है। अपनी गलती को तुरंत अंतःकरण से स्वीकार करना सीखना चाहिए। जैन धर्म में अपनी भूल स्वीकार करने के लिए एक शब्द ही पर्याप्त है और वह है मिच्छामी दुक्कड़म।

उन्होंने दक्षिण भारत के एक महान संत से जुड़ा प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक युवक संत के पास पहुंचा। उसके हाथ में एक अच्छी साड़ी थी। युवक ने संत से उसकी कीमत पूछी। संत ने बताया कि इसकी कीमत दो रुपए है। युवक ने साड़ी को दो टुकड़ों में फाड़ दिया और फिर कीमत पूछी। संत ने एक टुकड़े की कीमत एक रुपया बताई। युवक ने उसे फिर फाड़ दिया तो कीमत घटकर आठ आने रह गई। इसी तरह साड़ी को बार-बार फाड़ने पर एक समय संत ने कहा कि अब इस टुकड़े की कोई कीमत नहीं है।

संत ने युवक को समझाया कि वस्तु की कीमत केवल उसके टुकड़े होने से तय नहीं होती, बल्कि संसार उसके मूल्य का निर्धारण करता है। संत की बातों से युवक प्रभावित हुआ और उसने कहा कि उसने साड़ी फाड़ दी है, इसलिए वह उसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार है। इस पर संत ने पूछा कि जब उसने साड़ी खरीदी ही नहीं, तो उसकी कीमत क्यों चुकाएगा? यदि वह घर जाकर इस राशि का हिसाब देगा तो अपने पिता को क्या बताएगा।

युवक को संत की बात से अपने विवेक का बोध हुआ। उसने कहा कि वह अपने पिता को हिसाब में बताएगा कि उसने उस दिन धन नहीं, बल्कि विवेक पाया है। इसके बाद वह संत के चरणों में नतमस्तक हुआ और अपने जीवन की सभी बुराइयां छोड़ने का संकल्प लिया।

साध्वीश्री ने कहा कि संत की वास्तविक जीत तब होती है, जब उनके उपदेश से किसी व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन आता है। धर्म की प्रभावना केवल प्रवचन सुनने से नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारने से होती है। जब व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार कर उसे सुधारने का प्रयास करता है और जीवन को संयम एवं सदाचार की दिशा में ले जाता है, तभी जिनशासन की वास्तविक प्रभावना होती है।

इस अवसर पर श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली, आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 समिति के अध्यक्ष, महासचिव मुकेश निमाणी, सह-सचिव अभिषेक गोलछा एवं कोषाध्यक्ष चिंतन मालू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाजजन उपस्थित रहे।

स्वाध्यायी शिविर में धर्म-अध्ययन और आराधना।

आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत स्वाध्याय एवं धार्मिक आराधना को बढ़ावा देने के लिए स्वाध्यायी शिविर की दैनिक समय-सारणी निर्धारित की गई है। यह आयोजन पावन निश्रा एवं प्रेरणा प्रवचन प्रभाविका पूज्य मंजुला श्रीजी म.सा. आदि ठाणा के सान्निध्य में किया जा रहा है।

निर्धारित समय-सारणी के अनुसार प्रातः 6 बजे प्रतिक्रमण, 7 बजे सेवा पूजा एवं नवकारसी तथा 9 बजे प्रवचन होगा। इसके बाद प्रातः 10:15 से 11:30 बजे तक कल्पसूत्र वांचना होगी। दोपहर 12:15 बजे एकासना एवं भोजन तथा दोपहर 2:30 से 4:30 बजे तक पुनः कल्पसूत्र वांचना रखी गई है।

शाम 5 बजे बियासणा तथा शाम 6:15 बजे प्रतिक्रमण होगा। रात्रि में स्वाध्याय एवं शंका समाधान साध्वीजी म.सा. की समयानुसार किया जाएगा।

आयोजन में श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली तथा आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 समिति के अध्यक्ष, महासचिव मुकेश निमाणी एवं कोषाध्यक्ष चिंतन मालू सहित समिति के पदाधिकारी सहयोग कर रहे हैं।

आयोजकों ने श्रद्धालुओं से यथाशक्ति तप एवं धार्मिक आराधना करने का आग्रह किया है। शिविर का उद्देश्य श्रद्धालुओं को नियमित स्वाध्याय, धर्म-अध्ययन, तप और आत्मसाधना से जोड़ना है।

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