रायपुर - विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी चातुर्मासिक प्रवचनमाला में मुनि भगवंत श्रावक-श्राविकाओं को आत्मकल्याण का मार्ग बता रहे हैं। बुधवार को धर्मसभा में परम पूज्य मुनिश्री संवेगरत्न सागर म.सा. ने अनाचार छोड़कर आचार को जीवन में अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि संयम पथ का ताला अनाचार के त्याग की कुंजी से खुलेगा।
मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति की मन:स्थिति को उससे बेहतर कोई नहीं जान सकता। कई बार मनुष्य यह मानकर जीवन जीता है कि पैसा रहेगा तो प्रतिष्ठा बनी रहेगी। धन और मोह-माया की यही सोच व्यक्ति से अनेक प्रकार के पापकर्म करवा सकती है। इसलिए आत्मचिंतन जरूरी है कि हम जिस मार्ग पर चल रहे हैं, वह आचार का है या अनाचार का।
सम्यक दर्शन कठिन, अनाचार-दुर्ध्यान का त्याग जरूरी।
मुनिश्री ने कहा कि मोक्ष की दिशा में बढ़ना आसान हो सकता है, लेकिन सम्यक दर्शन प्राप्त करना कठिन है। सम्यक दर्शन की प्राप्ति के लिए अनाचार और दुर्ध्यान का त्याग करना होगा। जब जीवन में दुख, दुर्गति और पीड़ा बढ़ती जा रही हो तो व्यक्ति को अपने चिंतन और कर्मों की दिशा पर विचार करना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि हम वीतराग के वचन सुनते हैं, लेकिन वीतरागी जीवन को कठिन मानते हैं। परिवार में रहते हुए जीवन को सरल मानना ठीक नहीं है। परिवार में जितने सदस्य होते हैं, उतनी ही चिंताएं भी जुड़ती जाती हैं।
सुख की चाह में बढ़ रहे कर्मों पर भी करें विचार।
मुनिश्री ने कहा कि अज्ञान ध्यान में धर्म-अधर्म तथा पुण्य-पाप का विवेक नहीं रहता। हर व्यक्ति सुख चाहता है, लेकिन उस सुख की चाह में कितने कर्मबंध हो रहे हैं, यह समझना भी जरूरी है। जीवन में अनाचार और दुर्ध्यान का प्रवेश कैसे और क्यों होता है, इसका आत्मविश्लेषण करना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि अनुकूलता के प्रति राग और प्रतिकूलता के प्रति द्वेष ही अनाचार -दुर्ध्यान को जीवन में प्रवेश कराते हैं। इसलिए अनाचार को छोड़कर आचार में प्रवेश करना होगा, तभी संयम के मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ सकेंगे।
विकार और वासना चिंगारी मिलते ही भड़क जाते हैं।
मुनिश्री ने कहा कि आपको परमात्मा प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिले,लेकिन परमात्मा के जो वचन आपको प्राप्त हो रहे हैं उन्हें जीवन में स्वीकार करना चाहिए। आचार ध्यान को ग्रहण करने का पुरुषार्थ और अनाचार को त्यागने का पराक्रम होना चाहिए।
मुनिश्री ने विकार और वासना को केरोसिन के समान बताते हुए कहा कि केरोसिन चाहे कितने भी समय तक पड़ा रहे, लेकिन चिंगारी मिलते ही आग पकड़ लेता है। इसी तरह मन में मौजूद विकार और वासनाएं अवसर मिलते ही अनाचार का रूप ले सकती हैं। अनाचार ध्यान में अनुकूलता के राग का पोषण होता है। जीवन में आचार पथ की दृढ़ता लाना जरूरी है। यही संयम और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग है।