रायपुर - विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में गुरुवार को परम पूज्य मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. ने आचार और अनाचार के अंतर को समझाते हुए जीवन में सत्य, मर्यादा और विवेक को अपनाने का संदेश दिया। मुनिश्री ने कहा कि आचार पक्ष में सदैव सत्य की नींव मजबूत रखनी चाहिए। असत्य से बचना और अनाचार का त्याग करना ही धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने का पराक्रम है।
मुनिश्री ने कहा कि विवेकी श्रावक-श्राविका बनें। विवेक जागृत रहेगा तो अनाचार की छाया भी जीवन पर नहीं पड़ेगी। जीवन में आने वाली प्रतिक्रियाओं को समय रहते समझना और सुलझाना जरूरी है, क्योंकि प्रतिक्रिया नहीं सुलझी तो आगे चलकर वही एक्शन का रूप ले सकती है। व्यक्ति का जागृत विवेक सामने वाले के डिगते भावों को भी स्थिर करने में सक्षम होता है। इसलिए अनाचार पक्ष से हटकर आचार पक्ष में दृढ़ होना चाहिए।
आत्मचिंतन और प्रायश्चित जरूरी।
मुनिश्री ने कहा कि जीवन में आत्मग्लानि व आत्मचिंतन आवश्यक है। गुरु भगवंतों के समक्ष प्रायश्चित और आलोचना करने से व्यक्ति अपने दोषों को पहचानकर उनसे बाहर निकलने का प्रयास कर सकता है। कल्याण मित्र व्यक्ति के अनाचार को समाप्त कर उसे आचार और आत्मचिंतन की दिशा में ले जाने में सहायक हो सकता है।
मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति को अपनी भूमिका के अनुरूप आचार रखना चाहिए और हमेशा मर्यादा में जीवन व्यतीत करना चाहिए। जीवन में अनाचार के प्रसंग बहुत हो सकते हैं, लेकिन उन्हें मर्यादित करने और उनसे दूर रहने का प्रयास निरंतर होना चाहिए।
अज्ञान और अनाचार संसार के दो मूल पहिए।
मुनिश्री ने समझाया कि अज्ञान और अनाचार संसार की गति के दो मूल पहिए हैं। जब तक अनाचार को त्यागने का विचार मन में नहीं आएगा, तब तक भव सुधार की सोच भी उत्पन्न नहीं हो सकती। अनाचार की ओर मन में अनेक विकल्प आते रहते हैं। व्यक्ति आचार के मार्ग पर प्रवेश कर भी जाए, लेकिन यदि अनाचार के विचारों में उलझा रहा तो आचार से भटकने की संभावना बनी रहती है।
मुनिश्री ने कहा कि जीवन में आचार और अनाचार के बीच स्पष्ट भेद रेखा होना जरूरी है। जब व्यक्ति दोनों के अंतर को समझने लगेगा, तभी जीवन में आचार का वास्तविक प्रवेश होगा और उसका आचरण धर्ममय बन सकेगा।
चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया व महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि विवेकानंद नगर श्री संभवनाथ जिनालय में आज भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष निर्वाण कल्याण महोत्सव भक्तिभाव से मनाया गया। इससे पूर्व धर्मसभा में सम्यक रत्न सागर सुरीश्वरजी म.सा. के सांसारिक भतीजे नमन बरड़िया बीकानेर मौजूद रहे। चातुर्मास समिति ने उनका सम्मान किया। चातुर्मास में 49 दिवसीय श्री पंच परमेष्ठी श्रेणी तप एवं गिरनार नेमी तप गतिमान है। श्रावक और श्राविका जिनवाणी के श्रवण के साथ धर्म,ध्यान,तप के माध्यम से अपनी कर्मों की निर्जरा कर रहे हैं।