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हृदय आंगन में प्रभु महावीर का जन्म हो, ऐसी भावना होनी चाहिए : मुनिश्री संवेगरत्न सागर

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विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में सर्वमंगलमय वर्षावास के अंतर्गत चल रहे पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व में धर्म और भक्ति का वातावरण बना हुआ है।

रायपुर - विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में सर्वमंगलमय वर्षावास के अंतर्गत चल रहे पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व में धर्म और भक्ति का वातावरण बना हुआ है। धर्मसभा में रविवार को परम पूज्य मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. ने भगवान महावीर के जन्म के पश्चात के प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। मुनिश्री ने कहा कि हर व्यक्ति के हृदय आंगन में प्रभु महावीर का जन्म हो जाए, ऐसी भावना होनी चाहिए। प्रभु का जन्म केवल उत्सव नहीं,बल्कि जीवन में सत्य, अहिंसा और आत्मजागृति के उदय का प्रतीक है।


मुनिश्री ने भगवान महावीर के जन्म के बाद के प्रसंग को विस्तार से समझाते हुए बताया कि परमात्मा महावीर के जन्म के पश्चात स्वयं इंद्र आते हैं और उन्हें मेरु पर्वत पर ले जाते हैं। वहां इंद्र को ऐसा प्रतीत होता है कि परमात्मा का स्वरूप बहुत छोटा है, जबकि अभिषेक के लिए रखे गए कलश बहुत बड़े-बड़े हैं।

मुनिश्री ने बताया कि इंद्र के मन में उठी इस शंका का समाधान स्वयं परमात्मा ने किया। जब परमात्मा ने मेरु पर्वत को चलायमान किया तो इंद्र की शंका दूर हो गई। इसके बाद परमात्मा का विधि-विधान से अभिषेक किया गया। अभिषेक के पश्चात इंद्र परमात्मा को लेकर पुनः क्षत्रिय कुंड नगरी पहुंचे।


मुनिश्री ने भगवान महावीर के जन्म की सूचना महाराजा सिद्धार्थ तक पहुंचने का प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने बताया कि मधुरमुखी प्रियंबदा महाराजा सिद्धार्थ के पास पहुंचीं और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति का समाचार सुनाया। पुत्र जन्म की सूचना मिलते ही महाराजा सिद्धार्थ अत्यंत प्रसन्न हुए। खुशी में उन्होंने प्रियंबदा को रत्न और आभूषण प्रदान किए।

मुनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर के जन्म का प्रसंग हमें अपने भीतर भी आध्यात्मिक चेतना के जन्म की प्रेरणा देता है। जब हृदय में अहिंसा, प्रेम, करुणा और आत्मकल्याण की भावना जागती है, तभी जीवन में वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत होती है।


धर्मसभा में भक्तिभाव से मनाया गया परमात्मा का जन्मोत्सव।

चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया एवं महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि शनिवार शाम विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में भगवान महावीर स्वामी का जन्मोत्सव भक्तिभाव से मनाया गया। मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. के मुखारविंद से प्रभु महावीर के जन्म की घोषणा होते ही धर्मसभा जयकारों से गूंज उठी थी। श्रद्धालुओं ने अक्षत-फूलों की वर्षा की तो वहीं लाभार्थी परिवार ने थाल बजाकर खुशियां मनाईं और पालना झुलाकर मंगलगीत गाए।

मुनिश्री ने माता त्रिशला देवी के 14 महास्वप्नों का आध्यात्मिक महत्व बताते हुए कहा कि प्रत्येक स्वप्न आत्मशुद्धि, संयम, ज्ञान, वैराग्य और धर्म के संदेश देता है। धर्मसभा में महास्वप्नों के चांदी से निर्मित प्रतीकों के दर्शन कराए गए। लाभार्थी परिवारों ने 14 महास्वप्नों के प्रतीकों को विधिपूर्वक बधाकर मोतियों की माला पहनाई। समिति की ओर से लाभार्थी परिवारों का सम्मान कर महास्वप्नों की प्रतिकृति भेंट की गई।

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