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“लकीर बड़ी करें, किसी की लकीर छोटी नहीं” - आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

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हैदराबाद - हैदराबाद, त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 में परम पूज्य गुरुदेव खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. की पावन निश्रा में दिनांक 2 अक्टूबर 2026 को खरतरगच्छ युवा परिषद (KYUP), खरतरगच्छ महिला परिषद और ज्ञानवाटिका का त्रिदिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन प्रारंभ हुआ। प्रथम दिवस के उद्घाटन सत्र में संगठन, संस्कार, संवाद और जिनशासन के प्रति समर्पण को लेकर विविध वक्तव्य हुए।

उद्घाटन अवसर पर पूज्यश्री ने कहा कि आज हैदराबाद की बहुत चर्चा हो रही है। मोबाइल खोलते ही तरह-तरह की बातें सामने आती हैं। हर बात पर ध्यान देना आवश्यक नहीं, क्योंकि हमारा लक्ष्य अपने दृढ़ कदम सुंदर भविष्य की ओर बढ़ाना है। लेकिन भ्रम फैलने की स्थिति में सत्य को स्पष्ट करना भी आवश्यक है, क्योंकि जिन्हें वास्तविकता का पता नहीं, वे भ्रमित हो सकते हैं।

मारवाड़ी कहावत का उदाहरण देते हुए कहा कि “रोटी में नमक टिकता है, लेकिन नमक की रोटी नहीं बनती।” आज स्थिति ऐसी न हो जाए कि पूरी रोटी ही नमक की बन जाए। विवाद की मानसिकता रखने वालों को विवाद का कारण कहीं न कहीं मिल ही जाता है। जटाशंकर की कहानी के माध्यम से उन्होंने समझाया कि जिसका काम ही हर बात में गलती निकालना हो, उसके लिए बहाने कभी खत्म नहीं होते।

खरतरगच्छ के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख करते हुए पूज्यश्री ने कहा कि उपाध्याय मनितप्रभसागरजी ने वर्षों के पुरुषार्थ से सत्रह भागों में इतिहास का संकलन किया है। उसे पढ़कर अपनी परंपरा को समझें और आगे बढ़ें। हम अपनी लकीर बड़ी करने का पुरुषार्थ करें, लेकिन इसके लिए किसी और की लकीर छोटी न करें।

उन्होंने कहा कि भगवान महावीर की परंपरा में जिन-जिन गच्छों, आचार्यों और साधु-साध्वियों ने साधना, तपस्या, साहित्य और जिनशासन के लिए पुरुषार्थ किया है, वे सभी हमारे लिए आदरणीय हैं। कुलपाक तीर्थ किसी एक गच्छ का नहीं, समस्त जिनशासन का है। पालीताना, सम्मेदशिखर, गिरनार हो या कुलपाक—सभी तीर्थ हमारे हैं। आज विवाद नहीं, संगठन का युग है। श्वेतांबर और दिगंबर सभी को मिलकर अपने तीर्थों और मंदिरों की रक्षा करनी होगी।

पूज्यश्री ने KYUP और KMP को “दो आंखें” बताते हुए कहा कि दोनों को एक दिशा में देखना है। जीवन में Listening, Learning, Landing, Living और Loving को उतारें—सुनना, सीखना, जीवन में उतारना, उसी के अनुरूप जीना और अंततः जिनशासन के प्रति प्रेम एवं समर्पण रखना।

इस अधिवेशन का सुंदर संचालन मुनि श्री विरक्तप्रभसागरजी म.सा. करते हुए संगठन की सक्रियता एवं सकारात्मक दिशा पर विचार रखे। इस अवसर पर मुनि श्री महितप्रभसागरजी म.सा. एवं पूज्या साध्वी श्री प्रियश्रेष्ठांजनाश्रीजी म.सा. ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए अधिवेशन के उद्देश्यों, संस्कारों एवं युवा शक्ति की भूमिका पर मार्गदर्शन प्रदान किया।

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