रायपुर - चातुर्मास 2026 के पावन अवसर पर राजधानी रायपुर में आयोजित धर्मसभा में ज्ञान दिवस श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर ग्रंथ बोहराने का शुभ आयोजन संपन्न हुआ। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने जिनवाणी का लाभ प्राप्त किया तथा धर्ममय वातावरण में आत्मचिंतन और साधना का संकल्प लिया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्य साध्वी सिद्धांत ज्योति जी म.सा. ने कहा कि ज्ञान दिवस केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मजागरण का दिवस है। जहां-जहां आचार्य भगवंत विराजमान हैं, वहां चिंतन की धारा गंगा, यमुना और सरस्वती की भांति निरंतर प्रवाहित होती रहती है। जिनवाणी से बढ़कर कोई धन नहीं है, क्योंकि ग्रंथों में तीर्थंकरों की ऐसी अमृतमयी वाणी समाहित है, जो आत्मा को मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करती है।
उन्होंने कहा कि अहिंसा, संयम और तप धर्म के तीन ऐसे दिव्य स्तंभ हैं, जिनका पालन करने वाली आत्मा को देवता भी नमन करते हैं। जिस धर्म में ये तीनों गुण विद्यमान हों, वही धर्म सर्वोच्च मंगलकारी माना जाता है। जिनशासन की महानता इसी में है कि गुरु भगवंतों ने त्याग, तपस्या और साधना के माध्यम से इसे विश्व के लिए आदर्श बनाया है।
प्रवचन में समय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए साध्वीश्री ने कहा कि जीवन का प्रत्येक क्षण अनमोल है। घड़ी की प्रत्येक टिक-टिक हमें यह संदेश देती है कि समय का सदुपयोग धर्म, साधना और आत्मकल्याण में करना चाहिए, क्योंकि बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता।
त्याग और वैराग्य का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हुए पूज्यश्री ने कहा कि यदि एक छोटे बच्चे के सामने चॉकलेट और अंगूठी रख दी जाए तो वह चॉकलेट उठाएगा, जबकि एक बड़ा व्यक्ति अंगूठी को चुनेगा। लेकिन यदि यही दोनों वस्तुएं किसी साधु-साध्वी भगवंत के समक्ष रखी जाएं तो वे दोनों का त्याग कर वहां से आगे बढ़ जाएंगे। यही साधु जीवन की निष्पृहता, वैराग्य और त्याग की सर्वोच्च पहचान है।
उन्होंने श्रावक-श्राविकाओं से अपने धर्म के प्रति समर्पित रहने का आह्वान करते हुए कहा कि संसार के मोह-माया से जितना दूर रहेंगे, आत्मकल्याण का मार्ग उतना ही सहज होगा। सांसारिक आकर्षण में फंसकर जीवन का अमूल्य समय नष्ट नहीं करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को आत्मचिंतन करते हुए धर्म सीखने, समझने और आत्मा के उत्थान के लिए सदैव आगे आना चाहिए।
पूज्य साध्वी सिद्धांत ज्योति जी म.सा. ने कहा कि किसी को यह ज्ञात नहीं कि जीवन की संध्या कब आ जाए। इसलिए समय रहते परमात्मा से प्रेम जोड़ें, धर्ममार्ग पर चलें और अपने जीवन को सार्थक बनाएं। संसार केवल लोभ और मोह प्रदान करता है, जबकि धर्म शांति, ज्ञान और आत्मिक आनंद का मार्ग दिखाता है। परिस्थितियां कैसी भी हों, धर्म ही मनुष्य का सच्चा साथी है।
भगवान महावीर स्वामी के जीवन का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि उनके जीवन में अनेक कष्ट और उपसर्ग आए, लेकिन उन्होंने कभी क्रोध नहीं किया। वे प्रत्येक परिस्थिति में समता, धैर्य और मुस्कान के साथ अडिग रहे। यही जीवन का सर्वोत्तम आदर्श है।
उन्होंने बताया कि अठमतप की आराधना की दूसरी कड़ी में अशोक लूंकड ने की। निगोद तप का उत्तरपारणा 02 तारीख को होगा एवं तप 03 तारीख को प्रारंभ को होगा। रविवार को विशेष कार्यक्रम आयोजित होगा। सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया गया कि वे अधिक से अधिक संख्या में अपने परिवार एवं परिचितों के साथ उपस्थित होकर जिनवाणी का लाभ प्राप्त करें तथा परमात्मा की भक्ति और स्तुति का सौभाग्य अर्जित करें।
रविवार को सधार्मिक वात्सल्य का भी आयोजन किया जाएगा। समाज के सभी धर्मप्रेमी बंधुओं से इस पुण्यमय आयोजन में सहभागिता कर धर्मलाभ लेने की विनम्र अपील की गई।