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“माणिक्य स्वामी का प्राचीन स्वरूप : श्रद्धा के साथ इतिहास और प्रमाण को समझें” — आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

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हैदराबाद/रायपुर - हैदराबाद, त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी के प्रांगण में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत दिनांक 22 अगस्त 2026 चातुर्मासार्थ विराजमान परम पूज्य गुरुदेव राष्ट्ररत्न, खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने शनिवार के प्रश्नोत्तरी काल में कुलपाकजी तीर्थ से जुड़े एक प्रश्न का उत्तर देते हुए माणिक्य स्वामी के स्वरूप, नाम और प्राचीन इतिहास पर प्रकाश डाला।

गुरुदेव श्री ने स्पष्ट किया कि कुलपाकजी तीर्थ में विराजमान माणिक्य स्वामी आदिनाथ परमात्मा हैं, महावीर स्वामी नहीं। इस विषय में किसी प्रकार का भ्रम उत्पन्न करने के बजाय इतिहास और प्रमाण को समझना आवश्यक है। आचार्य जिनप्रभसूरि महाराज, जो लगभग सात-साढ़े सात सौ वर्ष पूर्व हुए और जिन्होंने अनेक तीर्थों का प्राचीन इतिहास प्राकृत भाषा में लिपिबद्ध किया, उन्होंने स्पष्ट रूप से कुलपाकजी तीर्थ के माणिक्य स्वामी को आदिनाथ परमात्मा कहा है। अतः ‘माणिक्य स्वामी’ आदिनाथ भगवान के लिए प्रयुक्त एक विशेष नाम अथवा विशेषण है।


परंपरा का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि भरत चक्रवर्ती ने अष्टापद तीर्थ पर चौबीसों तीर्थंकरों की रत्नमयी प्रतिमाएँ बनवाई थीं। उसी समय अपने अंगूठी के नीलमणि रत्न से आदिनाथ भगवान की एक विशेष प्रतिमा बनवाई गई, जिसे माणिक्य स्वामी कहा गया। परंपरा के अनुसार यह प्रतिमा आगे लंका ले जाई गई और वहाँ देवों द्वारा पूजित रही। बाद में राजा शंकरदेव इसे लेकर आए और जहाँ यह प्रतिमा रुक गई, वहीं मंदिर का निर्माण कराया गया। इसी स्थान को आज कुलपाकजी तीर्थ के रूप में माना जाता है। प्रतिमा की अंजनशलाका भी अष्टापद तीर्थ पर हुई थी। इसी कारण वहाँ अष्टापद मंदिर की स्थापना की भावना बनी।

गुरुदेव श्री ने कहा कि “जहाँ इतिहास स्पष्ट है, वहाँ अपनी कल्पनाओं से भ्रम पैदा करना उचित नहीं। श्रद्धा के साथ प्रमाण का सम्मान भी आवश्यक है।” उन्होंने समझाया कि धर्म के विषय में आस्था के साथ-साथ प्रामाणिकता, परंपरा और इतिहास का ज्ञान भी आवश्यक है। श्रद्धा तभी अधिक दृढ़ होती है, जब वह सही समझ और प्रमाण पर आधारित हो।

इसके साथ ही साधना के विषय में मार्गदर्शन देते हुए गुरुदेव श्री ने कहा कि धर्म-साधना की मूल बात भाव है। माला फेरते समय केवल संख्या पूरी करने का बोझ नहीं होना चाहिए, बल्कि मंत्र के प्रति आनंद और आत्मीयता होनी चाहिए। सामायिक में मन न लगे, तब भी सामायिक छोड़नी नहीं चाहिए। निरंतर अभ्यास से धीरे-धीरे मन उसमें रमने लगेगा। धर्म केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि भीतर जागने वाली भावना है। कर्मनिर्जरा केवल क्रिया से नहीं, बल्कि शुद्ध भावों से होती है।

उन्होंने कहा कि हमारी प्रत्येक धार्मिक क्रिया का उद्देश्य भीतर आत्मरुचि, आत्मजागरण और आत्मकल्याण की भावना को जागृत करना होना चाहिए। जब धार्मिक क्रिया भावपूर्ण बनती है, तभी वह आत्मा की यात्रा को आगे बढ़ाने वाली साधना बनती है।

प्रवचन के पश्चात प.पू. मुनि श्री विरक्तप्रभसागरजी म.सा. ने सभी तपस्वियों की सुख-शाता पूछते हुए आगामी दिवस के आचार्य श्री के प्रवचन का विषय बताया—“मेरे भाई, तुझी में, मेरी दुनिया समाई।”

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