रायपुर - ३ नवम्बर २०२६ श्री दिगम्बर जैन आदीश्वरधाम, नवोदय तीर्थ समयोपदेश वर्षायोग २०२६ के पावन अवसर पर श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर, मालवीय मार्ग, रायपुर (छ.ग.) में विराजित तपोनिष्ठ, प्रासुक साधना के धनी प.पु. मुनि १०८ श्री आगम सागर जी महाराज, मुनि १०८ श्री पुनीत सागर जी महाराज, एलक १०५ श्री धैर्य सागर जी महाराज एवं एलक १०५ श्री स्वागत सागर जी महाराज ससंघ का मंगल सानिध्य रायपुर की पावन धरा को प्राप्त हो रहा है।
वर्षायोग समिति के कार्यकारी अध्यक्ष संजय नायक जैन एवं सचिव श्री राजेश रज्जन जैन ने बताया कि आज दिनांक ३ नवम्बर २०२६ को प्रातः ८:०० बजे मूलनायक भगवान के समक्ष श्रीजी को पांडुकशिला में विराजमान कर अभिषेक, शांतिधारा एवं आचार्यश्री पूजन का सौभाग्य श्रावक बंधुओं को प्राप्त हुआ।
प्रातःकालीन धार्मिक कक्षा के दौरान मुनि १०८ श्री पुनीत सागर जी महाराज ने अपनी तत्त्वार्थ सूत्र की धार्मिक कक्षा में श्रावकों को संबोधित करते हुए बताया कि संसार में तीन चीजें निर्दोष और हितकारी हैं, जिन पर अटूट विश्वास किया जाता है—देव, शास्त्र और गुरु। ये हमेशा बने रहते हैं और यही सम्यक दर्शन कहलाता है। मुनि श्री ने दृष्टांत देते हुए समझाया कि घर का नवजात बच्चा एक वर्ष की आयु तक किसी की भी गोद में चला जाता है, किंतु एक वर्ष का होने पर वह अपरिचितों को देखकर रोने लगता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि एक वर्ष के बालक में भी ज्ञान और पहचान की क्षमता विकसित हो जाती है।
इसके पश्चात, मुनि १०८ श्री आगम सागर जी महाराज ने छह ढाला की छठी ढाल पर गहन अध्ययन करवाते हुए अपनी मंगल देशना प्रदान की। मुनि श्री ने संसार भावना का उल्लेख करते हुए बताया कि संसार की रीति ही ऐसी है जहाँ तन दुखी, मन दुखी और जीवन दुखी रहता है। जो व्यक्ति संसार से डरता है, वही इससे पार पाने का प्रयास करता है। चारों गतियों में कोई भी जीव वास्तव में सुखी नहीं है। स्वर्ग में यद्यपि भौतिक सुख कुछ होता है, किंतु वहाँ मानसिक दुख अधिक रहता है। ग्रंथों में व्याधि और आधि का वर्णन मिलता है, जहाँ स्वर्ग के देवता भी वैरागी जीवों को देखकर ईर्ष्या भाव रखते हैं।
मुनि श्री ने आगे समझाया कि यदि पड़ोसी ईर्ष्या करता है, तो वह जीवनभर करेगा, इसलिए दूसरों को बदलने के बजाय अपने आप को बदलो। पूर्व जन्म की तपस्या के प्रताप से इस जन्म में भी सभी नतमस्तक होते हैं और स्वर्ग के देवता भी संयमी संतों से वंदना करते हैं। अहिंसा महाव्रत का पालन करने वाला न किसी से डरता है और न किसी को डराता है। प्रत्येक जीव चारों गतियों में बार-बार भ्रमण करता है, जन्म लेता है और कर्मों का फल भोगता है। जो व्यक्ति संसार से ऊपर उठना चाहता है, उसकी राह अलग होती है। पर्याय पर दृष्टि रखने वाला हमेशा दुखी होता है, जबकि अपनी मूल आत्मा यानी द्रव्य पर दृष्टि रखने वाले को ही वास्तविक सुख की प्राप्ति होती है।
अशुभ कर्मों का फल व्यक्ति स्वयं ही भोगता है। जिस प्रकार बच्चे के जन्म के समय शारीरिक पीड़ा माँ को होती है और उस दर्द को देखकर पति भी संवेदनशील हो जाता है, परंतु हर जीव को अपने पुण्य और पाप का फल स्वयं ही भुगतना पड़ता है। मुनिराज स्वार्थ से ऊपर उठकर पुरुषार्थ करते हैं और जब उस पुरुषार्थ में परमार्थ जुड़ जाता है, तो जीव का कल्याण हो जाता है, जबकि घर-गृहस्थी का जीवन मुख्य रूप से स्वार्थ पर आधारित होता है।
मुनि ससंघ की पावन आहारचर्या
आज प्रातः ९:३० बजे सम्पूर्ण विधि-विधान और नवधा भक्ति के साथ मुनि ससंघ को पावन आहारचर्या का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिसका विवरण इस प्रकार है:
मुनि १०८ श्री आगम सागर जी महाराज को आहार देने का सौभाग्य श्रीमती पुष्पा जैन एवं श्री बंशी लाल जैन (मंदिर जी के सामने वाले) को प्राप्त हुआ।
मुनि १०८ श्री पुनीत सागर जी महाराज एवं एलक १०५ श्री स्वागत सागर जी महाराज को आहार देने का सौभाग्य श्रीमती सपना जैन एवं श्रीमती सरिता जैन (जैन बाड़ा वाले) को प्राप्त हुआ।
एलक १०५ श्री धैर्य सागर जी महाराज को आहार देने का सौभाग्य श्रीमती सुनीला जैन एवं गणेशराम नगर ग्रुप (गणेशराम नगर, रायपुर) को प्राप्त हुआ।
सूचनादाता - प्रणीत जैन (मीडिया प्रभारी)
श्री दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर, मालवीय मार्ग, रायपुर