कांकेर, राजापारा। भगवान मुनिसुव्रत जिनालय, राजापारा, कांकेर में जैन महिला मंडल के तत्वावधान में श्रद्धा, भक्ति एवं संस्कृति से ओत-प्रोत एक गरिमामय पुस्तक विमोचन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर श्रीमती अन्नपूर्णा देवी चोपड़ा द्वारा संकलित दो महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ—"देवी-देवताओं का गीत संग्रह" एवं "15 तिथि साधना संग्रह"—का भव्य विमोचन सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम में आशीर्वाद प्रदाता पाबूदान जी कोचर श्री हेमेंद्र जी गोलछा एवं श्री नरेश कुमार चोपड़ा उपस्थित थे। विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री देवेंद्र जी गोलछा (अध्यक्ष, कांकेर श्रीसंघ) तथा भारतीय जैन संघटना के विशिष्ट श्री प्रमोद जी चोपड़ा उपस्थित रहे। समारोह में श्रीसंघ के पदाधिकारी, श्रावक-श्राविकाएँ एवं बड़ी संख्या में मातृशक्ति की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का सफल संचालन जैन महिला मंडल की अध्यक्ष श्रीमती पूजा चोपड़ा ने किया। मंगलाचरण और दीप प्रज्वलन स्वागत गीत के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। उपस्थित अतिथियों ने अपने प्रेरणादायी विचार व्यक्त करते हुए दोनों पुस्तकों की उपयोगिता एवं धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व की सराहना की तथा श्रीमती अन्नपूर्णा देवी चोपड़ा को इस उत्कृष्ट साहित्यिक एवं धार्मिक योगदान के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ दीं।
श्रीमान देवेंद्र जी गोलछा ने बधाई देते हुए पुस्तक लिखने में अपने विचार व्यक्त किया श्रीमान प्रमोद जी चोपड़ा ने भी अपना विचार रखें।
अपने उद्बोधन में श्रीमती अन्नपूर्णा देवी चोपड़ा ने कहा कि "यह पुस्तक हमारी आस्था, संस्कार, संस्कृति और पारिवारिक परम्पराओं का जीवंत दस्तावेज है। बचपन से हमने अपने घरों में कुलदेवी -देवताओं के भक्ति गीतों को सुना है। उन्हीं गीतों ने हमारे जीवन में श्रद्धा, विश्वास और संस्कारों का संचार किया।
आज जीवनशैली बदल रही है और नई पीढ़ी आधुनिकता की ओर अग्रसर है। यदि हम अपनी धार्मिक परम्पराओं, लोकभक्ति के अमूल्य गीतों और साधना की परम्परा को सुरक्षित नहीं रखेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमारी इस सांस्कृतिक विरासत से वंचित हो जाएँगी।"
उन्होंने कहा कि "इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने 'देवी-देवताओं का गीत संग्रह' एवं '15 तिथि साधना संग्रह' का संकलन किया है, ताकि प्रत्येक परिवार, प्रत्येक माता एवं बहन इन्हें पढ़ सके, समझ सके और अपने जीवन में धर्म, संस्कृति एवं संस्कारों को आत्मसात कर सके।
यदि मेरा यह छोटा-सा प्रयास धर्म, संस्कृति और साधना की इस अमूल्य धरोहर को आगे बढ़ाने में थोड़ा भी योगदान दे सके, तो मैं अपने जीवन को धन्य समझूँगी।"
उन्होंने आगे कहा कि "जिस प्रकार हम अपने माता-पिता, सास-ससुर, दादा-दादी तथा परिवार के बुजुर्गों का आदर, सम्मान और सेवा करते हैं, उसी प्रकार श्रद्धा और विश्वास के साथ यदि हम अपने कुलदेवी-देवताओं की आराधना, पूजा और साधना करें, तो वे भी हमारे जीवन के रक्षक एवं संरक्षक बनकर हर कठिन परिस्थिति में हमारा मार्गदर्शन करते हैं।
यह मैं केवल पढ़कर या सुनकर नहीं कह रही हूँ, बल्कि अपने जीवन के अनुभव के आधार पर कह रही हूँ।"
उन्होंने अपने जीवन का अनुभव साझा करते हुए कहा कि "कुछ समय पूर्व मैं कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हुई थी। उस समय चिकित्सकों ने भी बहुत कम समय की आशा व्यक्त की थी। लेकिन ईश्वर की असीम कृपा, मेरे कुलदेवी -देवताओं के आशीर्वाद, धर्म-साधना, स्वाध्याय, परिवार के सहयोग तथा आप सभी की शुभकामनाओं के फलस्वरूप आज लगभग पंद्रह माह बाद मैं स्वस्थ होकर आप सभी के समक्ष खड़ी हूँ। यह मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं, बल्कि श्रद्धा, साधना और ईश्वर की कृपा का जीवंत उदाहरण है।"
उन्होंने कहा कि "बीमारी के समय जब असहनीय पीड़ा होती है, तब यदि हम अपने मन को लेखन, धर्म-साधना और स्वाध्याय में लगा दें, तो पीड़ा का अनुभव कम होने लगता है और मन को नई शक्ति मिलती है। कठिन समय में यही साधना और लेखनी मेरी सबसे बड़ी संबल बनी।"
अंत में उन्होंने सभी से आग्रह किया कि "अपने जीवन में धर्म, साधना, स्वाध्याय तथा कुलदेवी-देवताओं की आराधना को अवश्य स्थान दें। जब जीवन में कठिन समय आता है, तब धन, पद और प्रतिष्ठा से अधिक हमारा विश्वास, श्रद्धा और ईश्वर का सहारा ही हमें संभालता है।"
अपने उद्बोधन का समापन उन्होंने इन भावपूर्ण पंक्तियों के साथ किया—
भक्ति की यह ज्योति यूँ ही हर आँगन में जलती रहे,
संस्कृति की मधुर सरिता पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहती रहे।
आप सभी का स्नेह और आशीर्वाद यूँ ही मिलता रहे,
मेरी लेखनी धर्म-सेवा के पथ पर निरंतर चलती रहे।
कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों एवं उपस्थित श्रद्धालुओं ने दोनों पुस्तकों के प्रकाशन को समाज एवं आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहर बताते हुए इसकी मुक्त कंठ से सराहना की।