रायपुर - श्री जिनकुशलसूरि जैन दादाबाड़ी में रविवार को भव्य चातुर्मासिक मंगल प्रवेश के साथ आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 का शुभारंभ हो गया। प्रवर्तिनी निपुणाश्रीजी महाराज साहिबा की विदुषी शिष्या एवं प्रवचन प्रभाविका पूज्य मंजुला श्रीजी महाराज साहिबा के सान्निध्य में आयोजित इस आध्यात्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता निभाई।
प्रातः श्री ऋषभदेव मंदिर, सदर बाजार से पूज्य मंजुला श्रीजी म.सा., मृदुयशा श्रीजी म.सा., सम्यग्निधि श्रीजी म.सा. एवं सम्यग्प्रज्ञा श्रीजी म.सा. के मंगल प्रवेश की भव्य शोभायात्रा निकाली गई। श्रद्धालुओं के जयघोष, धर्मध्वज और भक्ति गीतों के बीच यात्रा एम.जी. रोड एवं जयस्तंभ चौक से होकर श्री जिनकुशलसूरि जैन दादाबाड़ी पहुंची, जहां साध्वी मंडल का भावपूर्ण स्वागत किया गया।
इस वर्ष आयोजित आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 की थीम "बाल संस्कार अभियान" रखी गई है। इसका उद्देश्य बच्चों में धार्मिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक संस्कारों का बीजारोपण कर उन्हें भारतीय संस्कृति और जैन दर्शन के मूल्यों से जोड़ना है।
चातुर्मास के दौरान प्रत्येक रविवार को विशेष संस्कार शिविर आयोजित किए जाएंगे। इन शिविरों में बच्चों को अष्टप्रकारी पूजन की विधि, दैनिक धार्मिक दिनचर्या, माता-पिता एवं गुरु वंदन, सदाचार तथा अनुशासित जीवन के संस्कार सिखाए जाएंगे। बच्चों को नियमावली पत्रक भी वितरित किए जाएंगे तथा निर्धारित नियमों का नियमित पालन करने वाले प्रतिभागियों को समय-समय पर प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे।
चातुर्मास आयोजन समिति के अध्यक्ष के साथ सह-सचिव अभिषेक गोलछा एवं कोषाध्यक्ष चिंतन मालू ने बताया कि 25 जुलाई से चातुर्मास की नियमित धार्मिक, आध्यात्मिक एवं संस्कारमयी गतिविधियां प्रारंभ होंगी। पूरे चातुर्मास के दौरान प्रवचन, स्वाध्याय, आराधना, तप एवं विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्मलाभ प्राप्त होगा। श्रद्धालुओं ने इस आयोजन को आत्मोत्थान और भावी पीढ़ी में संस्कार जागरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।
सम्यक दर्शन से मिलता है चित्त की प्रसन्नता का अमूल्य उपहार: साध्वी मंजुलाश्रीजी म.सा.
आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास के तहत आयोजित प्रवचन में पूज्य साध्वी मंजुलाश्रीजी महाराज साहिबा ने कहा कि सम्यक दर्शन की सोच अत्यंत उच्च और व्यापक होती है। सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति केवल अपने सुख-दुख तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दूसरों के सुख को अपना सुख और दूसरों के दुख को अपना दुख मानता है। ऐसा व्यक्ति भौतिक संसार को क्षणभंगुर समझकर उससे मोह नहीं रखता।
साध्वीश्री ने एक प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक दंपती सत्संग के लिए जा रहा था। रास्ते में पति को हीरों का हार दिखाई दिया। उसने सोचा कि पत्नी का मन उसमें आकर्षित न हो जाए, इसलिए वह उसे मिट्टी से ढकने लगा। यह देखकर पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा, "आप मिट्टी को मिट्टी से क्यों ढक रहे हैं?" पत्नी के इस उत्तर से पति को उसकी सम्यक दृष्टि का बोध हो गया।
उन्होंने कहा कि अनादिकाल से जीव संसार में भटक रहा है, जबकि उसका अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है। हालांकि मोक्ष तक पहुंचने का पहला और सबसे महत्वपूर्ण चरण सम्यक दर्शन है। जब यह प्राप्त हो जाता है, तब समझना चाहिए कि आत्मा अपने वास्तविक लक्ष्य के बहुत निकट पहुंच गई है।
साध्वीश्री ने कहा कि सम्यक दर्शन का सबसे बड़ा उपहार चित्त की प्रसन्नता है। इसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने एक सब्जी विक्रेता का उदाहरण दिया, जो खोटा सिक्का मिलने पर भी प्रसन्नतापूर्वक सब्जी देता था। उसका मानना था कि बाहरी परिस्थितियां नहीं, बल्कि मन की प्रसन्नता ही जीवन का वास्तविक धन है। जब वह बीमार पड़ा तो प्रभु के प्रति उसकी सच्ची भक्ति और प्रेम उसके अश्रुओं के रूप में प्रकट हुए।
प्रवचन के अंत में साध्वीश्री ने सभी श्रद्धालुओं से चातुर्मास के चार महीनों को आत्मशुद्धि का अवसर बताते हुए सम्यक दर्शन प्राप्त करने का पुरुषार्थ करने, कषायों का त्याग करने तथा धर्ममय जीवन अपनाने का आह्वान किया।
48 दिवसीय ‘श्री सम्मेत शिखर तप’ का आयोजन, 1 अगस्त से होगी आराधना।
आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत राजधानी रायपुर में 48 दिवसीय ‘श्री सम्मेत शिखर तप’ का आयोजन किया जाएगा। यह विशेष तप आराधना 1 अगस्त से 18 सितंबर 2026 तक प्रवर्तिनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका पूज्य निपुणाश्रीजी म.सा. की विदुषी शिष्या एवं प्रवचन प्रभाविका पूज्य मंजुलाश्रीजी म.सा. के पावन सान्निध्य में संपन्न होगी।
आयोजकों के अनुसार, ‘श्री सम्मेत शिखर तप’ जैन परंपरा का अत्यंत पुण्यदायी और आध्यात्मिक साधना का विशेष अनुष्ठान माना जाता है। इसका उद्देश्य तप, संयम, आत्मशुद्धि और धर्म आराधना के माध्यम से आत्मकल्याण की दिशा में साधकों को प्रेरित करना है। आयोजन का संदेश है—“आओ सब मिल करें आराधना, जीवन बने श्रेयकारी।”
इस तप में भाग लेने वाले साधकों को 48 दिनों तक नियमित आराधना, तप एवं धार्मिक अनुशासन का पालन करना होगा। आयोजन की एक विशेषता यह भी है कि तप पूर्ण होने के उपरांत सभी तपस्वियों को पवित्र श्री सम्मेत शिखरजी एवं पंचतीर्थ यात्रा कराई जाएगी।
आयोजकों ने बताया कि तप में शामिल होने के लिए पंजीयन की अंतिम तिथि 30 जुलाई निर्धारित की गई है। इच्छुक श्रद्धालु दादाबाड़ी कार्यालय, एम.जी. रोड, रायपुर में संपर्क कर अपना पंजीयन करा सकते हैं।
श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया और कार्यकारी अध्यक्ष अभय भंसाली ने बताया कि इस आध्यात्मिक आयोजन का आयोजन श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट, रायपुर तथा आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 समिति के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। समिति ने समाज के सभी श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में सहभागिता कर तप, संयम और आत्मसाधना के इस दुर्लभ अवसर का लाभ उठाने की अपील की है।