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जीवन की सार्थकता आत्मचिंतन, धर्म और गुरु की शरण में है : साध्वी सिद्धांत ज्योति जी म.सा.

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श्री विमलनाथ जैन मंदिर ट्रस्ट, एवं अद्भुत, अनुपम आध्यात्मिक चातुर्मास समिति के संयुक्त तत्वावधान में प्रवचन माला।

रायपुर - श्री विमलनाथ जैन मंदिर ट्रस्ट, एवं अद्भुत, अनुपम आध्यात्मिक चातुर्मास समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित चातुर्मास 2026 के अंतर्गत साध्वी सिद्धांत ज्योति जी म.सा. के पावन सान्निध्य में धर्मसभा का आयोजन हुआ। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और उन्होंने धर्म, अध्यात्म एवं आत्मकल्याण से जुड़े प्रेरणादायी प्रवचनों का श्रवण किया।

साध्वी जी ने अपने प्रवचन में कहा कि मनुष्य का वास्तविक सुख बाहरी भौतिक साधनों में नहीं, बल्कि आत्मा की पहचान और परमात्मा की आराधना में निहित है। उन्होंने कहा कि वर्गीय शतक जैसे आध्यात्मिक ग्रंथ संसार के वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं तथा मनुष्य को आत्मकल्याण का मार्ग दिखाते हैं। जब मनुष्य की दृष्टि बाहरी आकर्षणों से हटकर आत्मा की ओर जाती है, तभी उसके भीतर सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और भक्ति का प्रकाश जागृत होता है।

उन्होंने कहा कि संसार का स्वभाव मनुष्य को निरंतर प्रलोभनों में उलझाए रखना है। धन, वैभव, पद और प्रतिष्ठा की दौड़ कभी समाप्त नहीं होती। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है और यही अंतहीन लालसा मनुष्य को अशांत बनाए रखती है। उन्होंने कहा कि संसार का आकर्षण म्यान में रखी तलवार के समान है, जो बाहर से सुंदर दिखाई देती है, लेकिन असावधानी होने पर कष्ट का कारण बन सकती है।

साध्वीश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि मनुष्य प्रायः वही चाहता है जो उसके पास नहीं होता। यही मोह और अपेक्षाएं जीवन में असंतोष को जन्म देती हैं। इसलिए परिस्थितियों के पीछे भागने के बजाय आत्मा की ओर लौटना ही वास्तविक सुख और संतोष का मार्ग है।

उन्होंने कहा कि संसार मनुष्य को केवल धन अर्जित करना, सुविधाएं जुटाना और परिवार तक सीमित रहना सिखाता है, जबकि धर्म मनुष्य को संयम, करुणा, त्याग, सेवा और आत्मविकास की प्रेरणा देता है। यदि जीवन में केवल संग्रह होगा और सदुपयोग नहीं होगा तो लक्ष्मी भी स्थिर नहीं रह सकती। धन का महत्व तभी है जब उसका उपयोग धर्म, सेवा और समाजहित में किया जाए।

प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि जिस प्रकार रोगी स्वस्थ होने के लिए चिकित्सक के निर्देशों का पालन करता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति के लिए गुरु के उपदेशों को जीवन में उतारना आवश्यक है। मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसका सर्वोत्तम उपयोग धर्म साधना, आत्मचिंतन एवं सद्कर्मों में ही है।

साध्वी सिद्धांत ज्योति जी म.सा. ने भगवान महावीर के अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और संयम के सिद्धांतों को वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक बताते हुए कहा कि इन मूल्यों को अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन को शांत, संतुलित और सफल बना सकता है। उन्होंने सात नरकों का उल्लेख करते हुए प्रथम नरक रत्नप्रभा का वर्णन किया तथा शुभ-अशुभ कर्मों के परिणामों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि गुरु जीवन के अंधकार को दूर करने वाले प्रकाश स्तंभ हैं। गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण ही मनुष्य को परमात्मा की ओर अग्रसर करता है। गुरु को स्वीकार करने वाला व्यक्ति ही आत्मिक उन्नति के मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ सकता है।

धर्मसभा में आगामी रविवार को आयोजित होने वाले भव्य साधार्मिक भक्ति महोत्सव की जानकारी भी दी गई। इस आयोजन में भक्ति, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां एवं धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, वहीं बच्चों के लिए विशेष संस्कार एवं व्यक्तित्व विकास शिविर भी लगाया जाएगा। आयोजकों ने सभी श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त करने एवं नई पीढ़ी को धार्मिक संस्कारों से जोड़ने का आह्वान किया।

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