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“प्रश्न से जिज्ञासा तक, जीवन को दिशा देने वाली भगवतीसूत्र की वाणी” - आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

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हैदराबाद - हैदराबाद के त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर, कारवान दादावाड़ी में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत दिनांक 1 अगस्त 2026 को परम पूज्य गुरुदेव सूरि सम्राट, राष्ट्ररत्न, अवंती तीर्थोद्धारक, गुणायाजी तीर्थ जीर्णोद्धार प्रेरक, खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में कहा कि केवलज्ञान की प्राप्ति के पश्चात् तीर्थंकर परमात्मा समवसरण में विराजमान होकर समस्त जीवों के कल्याण हेतु दिव्य देशना प्रदान करते हैं। गणधर भगवंतों ने उस दिव्य वाणी को आगमों में गूँथा। वर्तमान में 45 आगम उपलब्ध माने जाते हैं, जिनमें भगवतीसूत्र सबसे विशाल, वंदनीय एवं श्रद्धा का केंद्र है। इसमें लगभग 36,000 प्रश्नों के माध्यम से जीवन के गूढ़ रहस्यों का समाधान प्रस्तुत किया गया है। गणधर भगवंतों, साधु-साध्वियों तथा श्रावक-श्राविकाओं की जिज्ञासाओं का समाधान स्वयं परमात्मा ने करुणापूर्वक प्रदान किया है।

गुरुदेव श्री ने कहा कि जीवन प्रश्नों से भरा हुआ है, किन्तु प्रत्येक प्रश्न एक समान नहीं होता। प्रश्न केवल जानकारी प्राप्त करने तक सीमित रहता है, जबकि जिज्ञासा का उद्देश्य स्वयं के जीवन एवं आचरण में परिवर्तन लाना होता है। शंका मन में विष के समान है, इसलिए उसका तत्काल समाधान करना आवश्यक है, अन्यथा वह श्रद्धा एवं सम्यक्त्व को दुर्बल कर देती है।

उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि गुरु का कठोर व्यवहार क्रोध नहीं, बल्कि शिष्य के निर्माण का माध्यम होता है। जिस प्रकार कुशल कुम्हार मिट्टी को आकार देता है तथा सुनार सोने को तराशकर आभूषण बनाता है, उसी प्रकार सद्गुरु अनुशासन के माध्यम से साधक के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। अतः किसी घटना को देखकर शंका पालने के स्थान पर उसका समाधान करना ही उचित है।

प्रश्नोत्तरी के दौरान गुरुदेव श्री ने पूजा-विधि, सामायिक, देवद्रव्य, ज्ञानद्रव्य, गुरुद्रव्य, साधारण द्रव्य तथा जीवदया द्रव्य के शास्त्रीय उपयोग की स्पष्ट व्यवस्था समझाते हुए कहा कि प्रत्येक द्रव्य का उपयोग उसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए, जिसके लिए वह समर्पित किया गया है।

अपने मंगल प्रवचन के समापन में गुरुदेव श्री ने भव्य, अभव्य एवं जातिभव्य जीवों का विवेचन करते हुए कहा कि यह जीव का पारिणामिक स्वभाव है। मनुष्य का पुरुषार्थ यही होना चाहिए कि वह अपने भीतर मोक्ष की पात्रता जागृत करे, अपनी शंकाओं का समाधान करे, जिज्ञासा को सदैव जागृत रखे तथा परमात्मा की वाणी के अनुसार अपने जीवन का रूपांतरण करे।

इस अवसर पर पूज्य मुनि श्री विरक्तप्रभसागरजी म.सा. ने जानकारी दी कि प्रत्येक शनिवार प्रवचन के दौरान प्रश्नोत्तरी का विशेष आयोजन रहेगा। जिन श्रद्धालुओं को अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करना हो, वे अपने प्रश्न निर्धारित पात्र में डाल सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि रविवार को “माँ ही महोत्सव” विषय पर परम पूज्य गुरुदेव श्री के श्रीमुख से विशेष प्रवचन का लाभ प्राप्त होगा तथा सभी श्रद्धालुओं से सपरिवार उपस्थित रहने का आग्रह किया। साथ ही प्रत्येक रविवार दोपहर 3:00 से 5:00 बजे तक आयोजित होने वाले बाल संस्कार शिविर की जानकारी देते हुए पंजीकरण हेतु ज्ञानवाटिका के प्रमुख श्री विक्रम सिंह ढड्ढा से संपर्क करने का अनुरोध किया।

कार्यक्रम का मंच संचालन श्री प्रितेश बोहरा ने किया। उन्होंने आवश्यक सूचनाएँ प्रदान करते हुए सभी तपस्वियों की सुखशाता पूछी तथा संपूर्ण चातुर्मास में साधर्मिक भक्ति के लाभार्थी खरतरगच्छ जैन श्री संघ, फीलखाना एवं आज से प्रारंभ हुई तीन दिवसीय सेवा के लाभार्थी आदिनाथ महिला मंडल, सीना बेकरी, हैदराबाद की अनुमोदना की।

इस अवसर पर चातुर्मास समिति के प्रधान संयोजक श्री कुशल कांकरिया सहित विभिन्न समितियों के सदस्य, बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाज के गणमान्य व्यक्तियों की गरिमामयी उपस्थिति रही।

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