रायपुर - विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में धर्म, तप और आत्मचिंतन की साधना के साथ धर्मज्ञान की गंगा प्रवाहित हो रही है। परम पूज्य मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. प्रतिदिन आचार्य वीरभद्राचार्य द्वारा रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से श्रावक-श्राविकाओं को आत्मकल्याण का मार्ग समझा रहे हैं। गुरुवार को धर्मसभा में मुनिश्री ने क्रोध के कारणों और उससे मुक्ति के उपायों की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए ईर्ष्या को भी क्रोध का प्रमुख कारण बताया।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को किसी के प्रति ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। ईर्ष्या के कारण मन में अशांति पैदा होती है और यही अशांति आगे चलकर क्रोध का रूप ले लेती है। यदि व्यक्ति अपने पुण्य और पाप का आकलन कर ले तो उसके मन में दूसरों के प्रति ईर्ष्या की भावना समाप्त हो सकती है। जीवन में जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह अपने कर्मों का परिणाम है और इस सत्य को समझ लेने पर दूसरों की उपलब्धियों को देखकर मन में जलन पैदा नहीं होगी।
मुनिश्री ने कहा कि जब क्रोध कषाय उदय में आता है तो व्यक्ति का बल और आवेश दोनों कई गुना बढ़ जाते हैं। उस समय मनुष्य सही-गलत का विवेक खो बैठता है और आवेश में ऐसे कार्य कर सकता है, जिनका परिणाम बाद में स्वयं उसे भुगतना पड़ता है। क्रोध की अवस्था में व्यक्ति अपने व्यवहार, वाणी और निर्णयों पर नियंत्रण खो देता है।
मुनिश्री ने धर्मसभा में समझाया कि क्रोध व्यक्ति के सदाचार और संयम को कमजोर करता है। कई बार गुणीजनों और संतों द्वारा समझाने-बुझाने तथा उचित बोध दिए जाने के बाद भी व्यक्ति क्रोध के प्रभाव में अपने अच्छे संस्कारों और सदाचार का त्याग कर देता है। इसलिए क्रोध को केवल एक क्षणिक भाव नहीं, बल्कि आत्मिक पतन का कारण समझना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि क्रोध के कारण व्यक्ति स्वयं दुखी होता है और उसके व्यवहार से परिवार एवं समाज में भी अशांति उत्पन्न होती है। क्रोध से उत्पन्न कटु वचन संबंधों में दूरी पैदा करते हैं और मन में वैर-विरोध की भावना को जन्म देते हैं। धीरे-धीरे यही भाव व्यक्ति को दुख, पीड़ा और दुर्गति की ओर ले जाने वाली श्रृंखला का कारण बन सकते हैं।
मुनिश्री ने श्रावक-श्राविकाओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि यदि जीवन में दुख, दुर्गति और पीड़ा की परंपरा में नहीं पड़ना है तो क्रोध का त्याग करना होगा। इसके लिए व्यक्ति को अपने भीतर उठने वाले क्रोध के भाव को पहचानना होगा और उसके उत्पन्न होने से पहले ही उसे शांत करने का प्रयास करना चाहिए। आत्मचिंतन, संयम, क्षमा और विवेक के माध्यम से क्रोध पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
धर्मसभा में मुनिश्री ने कहा कि दूसरों की उन्नति देखकर ईर्ष्या करने के बजाय उनके अच्छे कर्मों और गुणों की प्रशंसा करनी चाहिए। इससे मन में सकारात्मकता बढ़ती है और आत्मा पर पड़ने वाले नकारात्मक भावों का प्रभाव कम होता है। उन्होंने श्रावक-श्राविकाओं से धर्म के सिद्धांतों को केवल सुनने तक सीमित न रखते हुए उन्हें अपने व्यवहार और जीवन में उतारने का आह्वान किया।
वर्षावास के दौरान उपाश्रय में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं धर्मसभा में शामिल होकर मुनिश्री के प्रवचनों का लाभ ले रहे हैं। तप, त्याग, स्वाध्याय और आत्मचिंतन के माध्यम से श्रद्धालु आत्मशुद्धि की साधना में जुटे हुए हैं।