रायपुर - नवकार नगर स्थित श्री मुनि सुब्रत स्वामी जिनालय में पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन मुनि सर्वार्थ रत्न सागर जी म.सा. ने पांच कर्तव्यों का वाचन करते हुए श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण और धर्म आराधना का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ज्ञानी भगवंत फरमाते हैं कि आराधना हमेशा स्व के लिए करनी चाहिए। मनुष्य को अपनी सामर्थ्य के अनुसार धर्म आराधना में योगदान देना चाहिए तथा जितनी शक्ति दिव्य कार्यों के लिए देने की आवश्यकता हो, उतनी अवश्य देनी चाहिए। इस दौरान मुनि सन्व रत्न सागर जी म.सा. ने प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से जीवन में धर्म के महत्व को समझाया। उन्होंने बताया कि एक शावक का दो जहाज नहीं आया। इसी दौरान लोग उनसे बिजनेस के लिए दिए गए पैसों की मांग करने लगे। तब उन्होंने एक पत्र लिखा, जिसमें 'जय आदिनाथ' लिखा था और उन्हें पैसे मिल गए। उस धन का उपयोग गुरुभगवंत ने मंदिर निर्माण के लिए करने को कहा।
एक अन्य प्रसंग सुनाते हुए मुनि श्री ने कहा कि एक व्यक्ति से संत ने पवित्र यात्रा पर चलने के लिए कहा तो उसने यह कहते हुए बात टाल दी कि अभी समय नहीं है, बेटे की शादी करनी है। बेटे की शादी के बाद भी उसने समय नहीं होने की बात कही और इस तरह कई बार यात्रा को टालता रहा। आखिरकार एक दिन उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद जब वह स्वान के रूप में दिखाई दिया, तब भी संत ने उसे पवित्र यात्रा पर चलने के लिए कहा, लेकिन वह तब भी जाने को तैयार नहीं हुआ। प्रसंग के माध्यम से मुनि श्री ने संदेश दिया कि जीवन में धर्म और आत्मकल्याण के कार्यों को कभी टालना नहीं चाहिए, क्योंकि जीवन और समय दोनों अनिश्चित हैं। पर्युषण पर्व हमें आत्मचिंतन, संयम और आराधना के माध्यम से अपने जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देता है।
इस अवसर पर पांच ज्ञान की आराधना के लाभार्थी भी रहे, जिनमें मतिज्ञान के लाभार्थी श्री मंगलचंद जी, श्रुतज्ञान के लाभार्थी श्री पारस जी बरडिया, अवधिज्ञान के लाभार्थी श्री नेमीचंद जी टाटिया, मनःपर्याय ज्ञान के लाभार्थी श्री पदमजी बोथरा तथा केवलज्ञान के लाभार्थी श्री छाजेड़ परिवार एवं श्री पोथा जी रहे।