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“परिणाम लक्षी जीवन जीना ही जीवन की सच्ची कला है” — आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

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हैदराबाद/रायपुर - हैदराबाद, त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत 13 अगस्त 2026 को परम पूज्य गुरुदेव सूरि सम्राट, खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में जीवन को लक्ष्यपूर्ण और परिणामलक्षी बनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि हम जो भी काम करते हैं, सोचते हैं, बोलते हैं, खाते हैं या व्यापार करते हैं, उसके पीछे कोई न कोई लक्ष्य होता है। लेकिन हमें कभी रुककर यह भी विचार करना चाहिए कि सत्तर-अस्सी वर्ष की मिली हुई जिंदगी के समाप्त होने से पहले हम अपने जीवन से वास्तव में क्या प्राप्त करना चाहते हैं।

गुरुदेव श्री ने कहा कि हमें जो अनमोल साँसें, आँखें, कान, शरीर, बुद्धि, क्षमता और योग्यता मिली है, उसका हम अधिकतम उपयोग कर रहे हैं या न्यूनतम? जो कुछ प्राप्त कर रहे हैं, वह हमारे जीवन में शांति ला रहा है या अशांति? जिंदगी एक सौदा है। यदि अनमोल साँसों के बदले हमने केवल पैसा, संपत्ति, यश और सम्मान ही प्राप्त किया, तो यह घाटे का सौदा है। इन्हीं साँसों का सदुपयोग करके परम शांति और परम समाधि प्राप्त की जा सकती है।

उन्होंने कहा कि अपने अंतर में एक सूत्र पत्थर की लकीर की तरह लिख लेना चाहिए—“मेरा जीवन परिणामलक्षी होना चाहिए।” कोई भी कार्य करने, बोलने या निर्णय लेने से पहले उसके परिणाम पर विचार करना चाहिए। पहले परिणाम देखो, फिर बोलो, फिर सोचो और उसके बाद कदम आगे बढ़ाओ। हमें यह भी देखना चाहिए कि हमारे व्यवहार का परिणाम क्या होगा और हमारी आत्मा पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। इससे कर्मबंधन होगा या कर्मों की निर्जरा—इसका विचार जीवन के प्रत्येक निर्णय में होना चाहिए।

विपरीत परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन में परिस्थितियाँ हमेशा मनचाही नहीं होंगी। ऐसे समय हमारे सामने तीन विकल्प होते हैं—प्रतिकार, स्वीकार और सत्कार। प्रतिकार अर्थात परिस्थिति का विरोध करना और उससे संघर्ष करना। स्वीकार अर्थात परिस्थिति को मजबूरी में मान लेना, लेकिन भीतर पीड़ा और शिकायत बनाए रखना। जबकि सत्कार का अर्थ है विपरीत परिस्थिति को भी आदरपूर्वक स्वीकार करते हुए उसमें छिपी सीख, अवसर और आत्म-विकास के मार्ग को पहचानना।

भगवान महावीर के जीवन में भी अनेक विपरीत परिस्थितियाँ आईं, लेकिन उन्होंने उनका प्रतिकार नहीं किया, बल्कि उनका सत्कार किया। इसलिए जीवन का प्रश्न यह नहीं है कि परिस्थिति कैसी आएगी, बल्कि यह है कि परिस्थिति आने पर हमारी दृष्टि कैसी होगी।

जीवन को क्रिकेट से जोड़ते हुए कहा कि जिंदगी क्रिकेट के खेल जैसी है। हर गेंद हमारी पसंद की नहीं आती, लेकिन हर गेंद खेलनी पड़ती है। हर गेंद पर चौका या छक्का लगाना जरूरी नहीं, क्रीज पर टिके रहना जरूरी है। जीवन में कभी सुख की गेंद आएगी तो कभी दुःख की, कभी सफलता मिलेगी तो कभी असफलता। हमें हर परिस्थिति को सावधानी और संतुलन के साथ खेलते हुए जीवन की क्रीज पर टिके रहना है।

परिणाम को ध्यान में रखकर किया गया प्रत्येक विचार, वाणी और व्यवहार जीवन को सही दिशा देता है। परिणामलक्षी जीवन वही है, जिसमें हम केवल यह नहीं देखते कि अभी क्या अच्छा लग रहा है, बल्कि यह भी देखते हैं कि इसका परिणाम मेरी आत्मा के लिए क्या होगा। यही परिणामलक्षी जीवन और जीवन जीने की सच्ची कला है।

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